अब तक आप लोगों ने पढ़ा कि किस तरह मेरे आकर्षण में बंधे अपने कोख जाए युवा पुत्र क्षितिज की नादान जिद के सम्मुख मैं खुद को समर्पित कर बैठी थी। हालांकि शायद मेरे अंदर दिल के किसी कोने में कहीं न कहीं यह चाहत दबी हुई थी, जो क्षितिज के प्राकृतिक पुरुषजनित आकर्षण, नादानी भरे आग्रह और हरकतों से शनैः शनैः जागने लगी थी और जिसका अंत मेरे बिस्तर पर इस तरह हुआ। आज रात को फिर वही क्रम दुहराया जाने वाला था, इसका आभास उसने मुझे करा दिया था। मैं मन ही मन उसके लिए तैयार थी। मैं क्षितिज के शॉपिंग और सिनेमा देखने के प्रस्ताव में सहमति दे तो चुकी थी किंतु कर रात भर के थकान के आलस्य के मारे कुछ आराम करना चाहती थी, अतः उसके कमरे के दरवाजे पर पहुंच कर आवाज दी, “क्षितु बेटा, जरा सुनो तो।”
“क्या हुआ मॉम?” जब वह दरवाजा खोला तो रात भर के जागरण के कारण उसकी आंखें लाल और नींद से बोझिल थीं। “अंदर आओ न मॉम”
“नहीं, मैं केवल यह कहने आई थी कि अभी दिन में आराम कर लो, फिर हम शाम को शॉपिंग के लिए जाएंगे।”
“अरे मेरी जान अंदर तो आईए।” कहते हुए मुझे कमर से पकड़ कर अंदर खींच लिया और दरवाजा बंद कर दिया। वही रात वाली प्यास दृष्टिगोचर हो रही थी उसकी आंखों में।
“अरे क्या करते हो? छोड़ो मुझे शैतान।” घबराहट में छटपटाते हुए बोली।
“छोड़ दूंगा मॉम, छोड़ दूंगा, पहले एक पप्पी तो ले लूं।” कहते कहते मुझे संभलने का मौका दिए बिना अपनी मजबूत बांहों में कस कर जकड़ लिया और अपने होंठों को मेरे होठों से चिपका दिया। यह एक गरमागरम चुंबन था जो मेरे अंदर की वासनामयी नागिन को जगाने के लिए काफी था। मेरे अंदर की कामुकता भरी ज्वालामुखी का लावा खौल उठा। मैं उसकी बांहों में कसी तड़प उठी। करीब एक मिनट के लंबे चुंबन के बाद जब उसने मुझे छोड़ा तो मेरी हालत बद से बदतर हो चुकी थी। सांसें मेरी धौंकनी की तरह चल रही थीं। उरोज मेरे तन चुके थे। योनि मेरी फड़फड़ा कर पानी छोड़ने लग गई थी। एक ऐसी मछली की तरह हो गयी थी मेरी हालत जिसे पानी से निकाल कर सूखे पर रख दिया गया हो।
“बदमाश, यह क्या कर दिया रे, ओह मेरे रसिया?” कहकर मैं अपनी सारी निद्रा और थकान भूल कर दुबारा उसके बदन से चिपक गई और अपनी बांहों में भर कर उसके होंठों को बेहताशा चूमने लग गयी। भड़क उठी थी मेरी कामुक शैतानी भावनाएं। कैसे अपनी भावनाओं पर काबू रख सकती थी भला। हो सकता है उसने बिना कुछ सोचे समझे अपने स्वभाविक लगाव का प्रदर्शन किया हो लेकिन मेरी प्रतिक्रिया अस्वभाविक तौर पर कुछ अधिक ही आक्रामक थी, खुद को रोक सकने में नि:शक्त, असमर्थ। इतना काफी था उस नये नये स्त्री संसर्ग का स्वाद चखे हुए नवयुवक के लिए। पिल ही तो पड़ा वह पागल मुझ पर।
“उफ्फ्फ मेरी प्यारी मुनिया की मालकिन मॉम, पपलू मेरा गोता लगाने को बेताब हो गया है, ओह्ह्ह्ह्ह्ह माई स्वीटी।” फिर कहां रुक सकता था वह पागल रसिया। मेरी प्रतिक्रिया, जो एक प्रकार से मेरे समर्पण का संकेत था, जिसे समझने में उसने पल भर भी देर नहीं की, मुझे सीधे उठा कर बिस्तर पर पटक दिया और आनन फानन मेरे कपड़ों से मुझे मुक्त कर दिया।
“ओह मेरे राजा, पागल रसिया, मेरे अनाड़ी बेटे, मुझे भी पागली बना दिया शैतान, अब देख क्या रहा है, आ भी जा अपनी मां के तन में डुबकी लगा ले, देख मेरी मुनिया को तेरे पपलू के लिए कैसे फकफका दिया है तूने मेरे कामदेव।” अपनी बांहें फैला कर अपनी नग्न देह को परोस देने को तत्पर हो गयी। छिनाल तो थी ही एक नंबर की, नि:संकोच, पूर्ण निर्लज्जता के साथ, पूर्ण समर्पिता बनी पसर गयी थी।
“आया जानेमन, आया।” वह भी बिना एक पल गंवाए पूरी तरह नंगा हो गया और कूद कर मेरी नग्न देह पर छा गया। बेकरारी से मेरे उरोजों को चूसने लगा, मसलने लगा, उससे मन नहीं भरा तो सीधे 69 पोजीशन में आ गया और मेरी योनि को पागलों की तरह चाटने लगा।
“उफ्फ्फ राजा बेटा, मेरा चोदू बेटा, ओह मादरचोद बबुआ,” मेरे मुख से बेसाख्ता निकलने लगा, इतने उत्तेजक आनंदमय लम्हे थे वे। उसका शरीर जिस स्थिति में था उस स्थिति में जहां उसका मुंह मेरी योनि पर चिपका हुआ था, वहीं उसका निहायत ही खूबसूरत लिंग अपने पूरे जलाल के साथ मेरे मुख के पास चिकने सिंगापुरी केले की तरह झूल रहा था। मैं बेगैरत, बेशरम छिनाल, मां बेटे के पावन रिश्ते को शर्मसार करती हुई, निर्लज्जता की पराकाष्ठा को पार करती हुई, बेहयाई पर उतर आई और बदहवासी के आलम में गपागप उसके तनतनाए पपलू को मुंह में ले कर चूसने में मशगूल हो गयी। कुछ देर इसी तरह चूसने चाटने का दौर चलता रहा। आह्ह्ह्, ओह्ह्ह्ह्ह्ह, स्वर्गीय सुख की अनुभूति हो रही थी। वासना का तूफान सर चढ़ कर बोल रहा था। विहंसता शैतान अपनी विजय पर इठला रहा था और नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले फरिश्ते शर्म के मारे सर छुपाने के लिए स्थान तलाश कर रहे थे।
“ओह मेरे मादरचोद बेटे, अब और नहीं, अब चोद भी डाल कमीने अपनी मां की चूत।” उत्तेजना के आवेग में मैं पूरी तरह रंडी बनी हांफती कांपती बोल उठी।
“हां मेरी चूतमरानी मॉम, अब ये ले मेरा पपलू अपनी मुनिया के अंदर,” उसने पैंतरा बदल कर आव देखा न ताव, ठूंस दिया भक्क से पूरा का पूरा लंड मेरी चूत में और मेरे नितंबों को कस के दबोच कर किसी स्वचालित यंत्र की तरह भच्च भचाभच चोदने में मशगूल हो गया। “आह, ओह मेरी प्यारी मॉम, माई स्वीट मॉम, चूतमरानी मॉम, मस्त मॉम, आह ओह्ह्ह्ह्ह्ह, स्वर्ग का सुख है मेरी बुरचोदी मॉम आपकी मुनिया में”, कहते हुए चोदे जा रहा था मुझे, भंभोड़े जा रहा था मुझे, निचोड़े जा रहा था मुझे, और मैं कमीनी कुतिया, उसके शरीर से चिपटी, अपनी टांगों को उठाए कमर उछाले जा रही थी, गुत्थमगुत्था हुई जा रही थी, अपने बेटे को पूरी तरह अपने अंदर समा लेने की जद्दोजहद कर रही थी। सारी शर्मोहया को तो पहले ही त्याग चुकी थी, वो तो जैसे घुस कर अंतर्ध्यान हो गई थी मेरी कामुक देह की वासना से धधकती चूत में। मेरा नादान बेटा, नैतिकता अनैतिकता के ज्ञान से मरहूम, सीख गया था, कर गया था, कर रहा था, ऐसा गंदा काम, जिसे हमारा सभ्य समाज घृणा की दृष्टि से देखता है। व्याह पूर्व नारी देह से संसर्ग की कला और नारी देह भी किसकी? अपने खुद की मां की और मैं कुलटा, उसे अपनी कामुकता की भट्ठी में झोंकती मुदित हो रही थी।
“ओह राजा, ओह्ह्ह्ह्ह्ह बेटा, हां हां हां हां, चोद अपनी मां को मादरचोद, चोद अपनी गर्लफ्रैंड को चोदू डियर, जी भर के प्यार कर, खेल मेरे अंग अंग से मां के लौड़े।” मैं असहनीय उत्तेजना में तड़फड़ाती, बड़बड़ाती जा रही थी, पूरी बेहयाई पर उतर आई थी मैं। ऐसा भीषण तूफान उठा था वासना का कि हम एक दूसरे से लिपटे चिपटे कमर चलाते इधर उधर लुढ़क रहे थे। कभी वह ऊपर कभी मैं ऊपर।
करीब आधे घंटे की कमरतोड़ चुदाई के पश्चात स्खलन का उस बेहद सुखद, स्वर्गीय अहसास से दो चार होते हुए हम एक दूसरे से चिपके निढाल हो गये। “आह्ह्ह् मेरी प्यारी मॉम, जन्नत है जन्नत तेरे बदन में, उफ्फ्फ मेरी स्वर्ग की अप्सरा, भगवान करे इसी तरह लिपटे रहूं, चिपटे रहूं, तुझ में समाया रहूं।” वह अनंत सुख में डूबे आंखें बंद किए बोला।
“हां मेरे बच्चे, मेरी हालत भी कुछ ऐसी ही है। हम एक दूसरे की बांहों में समाए रहें, सदा सदा के लिए। खेलते रहें एक दूसरे के तन से। लेकिन इसके साथ साथ कई और भी बातें ऐसी हैं जिसका हमें निर्वाह करना है मेरे बच्चे, जैसे दिखावे के लिए ही सही, समाज की नजरों में हमारे मां बेटे के संबंध का निर्वाह, हमारी जीविका के लिए मेरा कार्य, जैसे तुम्हारी पढ़ाई और अपने स्वर्णिम भावी कैरियर की तैयारी। इन सब चीजों का भी उतना ही ख्याल रखना है मेरे बच्चे।” मैं बड़े लाड़ से उसके सीने पर सर रख कर बोली।
“ओके मॉम डन। ऐसा ही होगा मेरी जान। तुम देखोगी कि तुम्हारे प्यार में पागल यह बंदा न तुम्हारे ऊपर, न ही अपने ऊपर किसी को उंगली उठाने का मौका देगा। बस तू अपना प्यार इसी तरह मुझ पर लुटाती रह। आप टेंशन न लो मॉम, मैं अपने जीवन में सफलता का झंडा गाड़ दूंगा, फिलहाल तो एक बार और मुझे अपनी मुनिया में डंडा गाड़ने दे। देख कैसे खड़ा होकर तेरी मुनिया को सलाम कर रहा है, साला मानता ही नहीं मादरचोद।” अपने टनटनाए लिंग को दिखाते हुए वह बोला।
उसकी बातों में आत्मविश्वास का पुट देख मन प्रसन्न हो उठा। मुदित मन से बोली, “गुड ब्वॉय। खुश कर दिया तूने। इसी बात पर एक और चुदाई तो बनती है। चोद ले मेरे बच्चे अपनी मम्मी को, आजा मेरे तन मन के रसिया, मेरे प्यारे मादरचोद बेटे।”
बस मेरे कहने की देर थी कि एक और चुदाई का दौर चालू हो गया, गचागच, फचाफच, चपाचप, ओह्ह्ह्ह्ह्ह अंतहीन आधे घंटे की घमासान चुदाई। फिर नुची चुदी, थकान से लस्त पस्त, अस्त व्यस्त, मैं हांफती कांपती, किसी प्रकार खुद को संभालते, थरथराते कदमों से अपने कमरे में आकर पसर गई। पता नहीं दोपहर के खाने के लिए उठुंगी भी या नहीं, फिर शाम को शॉपिंग भी तो करनी है, यही सोचती हुई कब मेरी आंख लग गई पता ही नहीं चला।
इसके आगे की घटना अगली कड़ी में।
तबतक के लिए मुझे आज्ञा दीजिए।
आपलोगों की कामुक लेखिका
रजनी

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